कहाँ झूठे दिलासों से मुझे आराम आएगा।
सुकूं दिल को मिलेगा जब तेरा पैग़ाम आएगा।।
लबों पर आह है दिल में ख़लिश आंखों में वीरानी।
अग़र आग़ाज़ ऐसा है तो क्या अंज़ाम आएगा।।
मना कर दो दिवानों को न जाएं बज़्म में उनकी।
वहाँ से जो भी लौटेगा ज़िगर को थाम आएगा।।
अदावत से नहीं होता है कुछ हासिल ज़माने में।
मग़र ज़ज्बा मुहब्बत का हमेशा काम आएगा।।
अभी चुपचाप सहता आ रहा हूँ दर्द मैं लेकिन।
बड़ी तकलीफ़ होगी तुझपे जब इल्ज़ाम आएगा।।
किया जैसा किसी ने वैसा ही बदले में पाया है।
नहीं काँटों के पौधों से निकलकर आम आएगा।।
यहाँ जितने भी रिश्ते हैं टिके हैं झूठ पर सारे।
ज़ुबाँ पे सच अग़र आ जाए तो कोहराम आएगा।।
रज़ा जब तक ख़ुदा की है तभी तक चल रहीं साँसें।
मग़र कब आदमी के दिल में ये इलहाम आएगा।।
जिसे हो जाएगा अहसास अपनी भूल का "तन्हा"।
वो भूला सुब्ह का फिर लौटकर घर शाम आएगा।।
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